कविताएं – यश मालवीय : जब जैसा राजा बोलेगा / ठोस लिखना या तरल लिखना सिंहासन के आगे-पीछे

 

जी भर डोलेगी
जब जैसा राजा बोलेगा
परजा बोलेगी
राजा अगर हँसेगा
तो परजा भी हँस देगी
समझ न पाएगी अपनी
गर्दन ही कस लेगी
जागी-सी आँखों देखेगी सपना,
सो लेगी
खून चूसते जो
उन पर ही वारी जाएगी
हर उड़ान, उड़ने से पहले
मारी जाएगी
उम्मीदों के नुचे हुए से
पर ही तोलेगी
अंधियारों के जख्म
रोशनी के प्यासे होंगे
हर बिसात पर
उल्टे-सीधे से पाँसे होंगे
सिसक-सिसककर हवा चलेगी
आँख भिगो लेगी
तुम्ही हो माता, पिता तुम्हीं हो
गाती जाएगी
आँगन होगा, आँगन से
सँझवाती जाएगी
दुनिया अपनी साँस गिनेगी
नब्ज टटोलेगी
राजभवन के आगे भी
कुछ भिखमंगे होंगे
तीन रंग वाले किस्से भी
सतरंगे होंगे
धूप जल रही सी पेशानी
फिर-फिर धो लेगी

ठोस लिखना या तरल लिखना
दोस्त मेरे कुछ सरल लिखना
आस्था के सिन्धु मंथन में
नाम पर मेरे गरल लिखना
भोर में भी एक सो रहे हैं जो
नींद में उनकी खलल लिखना
पाँव जब पथ से भटकते हों
गाँव की कोई मसल लिखना
झूठ का चेहरा उतर जाए
बात जब लिखना असल लिखना
पेट की जो आग है उसको
आग में झुलसी फसल लिखना

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