कविता – बोधिसत्व — तुम मुझे वोट दो/मैं तुम्हें युद्ध दूँगा — अच्छे दिन देखना है, साहेब ! बताओ किधर देखूँ ?

 

तुम मुझे वोट दो
मैं तुम्हें युद्ध दूँगा
लहूलुहान भव्य देश दूँगा
और विराट देश को झुकने नहीं दूँगा
मैं देश को बेच दूँगा लेकिन उसे बँटने नहीं दूँगा
तिनका तिनका कर दूँगा
चिथड़े उड़ा दूँगा लेकिन मिटने नहीं दूँगा
बस ध्यान से तुम मुझे वोट दो
दो वोट दो!
तुम बूथ मजबूत करो और मुझे वोट दो
तुम मुझे खून दो खौलता हुआ खून
मेरे नाम का जयकारा लगाओ
मैं तुम्हें भाषण और नारे में लिपटा महायुद्ध दूँगा।
क्योंकि
युद्ध तुम्हारी समस्यायों का निदान है
युद्ध हमारी समस्यायों का निदान है
हर मुश्किल पर बारूद गिरा दो
हर विचार पर बारूद गिरा दो
हर बात पर बारूद गिरा दो
भविष्य पर बारूद गिरा दो
सपनों पर बारूद गिरा दो
और मिल कर बोलो
बारूद ही भविष्य है
युद्ध ही भविष्य है
तो लो
यह युद्ध लो युद्ध लो युद्ध लो लो लो युद्ध लो
वोट दो वोट दो वोट दो वोट दो वोट दो दो !

अच्छे दिन देखना है, साहेब ! बताओ किधर देखूँ ?
मुझे पत्थर नहीं चलाना
पैलटगन की गोली से
मुझे आँख नहीं फोड़वाना
अच्छे दिन देखना है, साहेब ! बताओ किधर देखूँ ?
मुझे नारा नहीं लगाना
मुझे चाय की चाशनी में
डूबे भाषण नहीं चबाना
अच्छे दिन का स्वागत करना है, द्वार कब खोलूँ ?
मुझे मन्दिर नहीं जाना
मुझे मस्जिद नहीं जाना
बस पन्द्रह लाख है पाना
सरकार, तुम्ही बताओ, कितने आधार लिंक करूँ ?
राफेल का हिसाब नहीं पाना
तेल गैस भी सस्ता नहीं पाना
बच्चों को है इनसान बनाना
बताओ मालिक, उनको किस पाठशाला में रखूँ ?
पाकिस्तान की तुम जानो
गंगा मैया की तुम जानो
अपने गाय बैल लेकर
बताओ प्रभुजी, किस सड़क से जिन्दा घर पहुँचू ?

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