अफ्सपा – एक काला कानून – अब असम से हटाने जा रही मोदी सरकार – इस कानून की आड़ में जनता पर जुल्म ढाते रहे हैं फौज और अन्य सुरक्षा बल !

 

गुवाहाटी। हमारी फौज और अन्य सुरक्षा बल जनता की रक्षा ही नहीं करते बल्कि काफी जुल्म भी ढाते हैं। यह सच्चाई है। एक बहुत जनविरोधी और सुरक्षा बलों के मनमानियों की रक्षा करने वाला कानून है अफ्सपा (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर ऐक्ट)। अब इसे असम से हटाया जाने वाला है। लंबे अर्से से देश में मानवअधिकार और लोकतंत्रवादी इस कानून का विरोध कर रहे थे। लागू होने के 29 सालों के बाद राज्य से इस कानून को अगस्त में हटाने का फैसला किया गया है और सेना को वापसी के लिए तैयारियां शुरू करने का निर्देश दिया गया है।
असम में 27 नवंबर 1990 को अफ्सपा को उस वक्त लागू किया गया था, जब उल्फा उग्रवाद अपने चरम पर था। पूरे राज्य को अशांत क्षेत्र घोषित करने के बाद अफ्सपा लागू हुआ था, जिसके तहत सशस्त्र बलों को क्या विशेष अधिकार हासिल हैं। कुछ सालों में कई सारे जिलों में स्थिति सुधरने पर सेना को धीरे-धीरे कर हटा दिया गया। पुलिस और पैरामिलिट्री ने सेना की जगह ले ली। पिछले साल सितंबर में केंद्र ने राज्य को यह अधिकार सौंपा कि वह अफ्सपा को बढ़ा या हटा सकती है। प्रदेश सरकार ने दो बार इस कानून को आगे बढ़ाया, जिसमें नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स की प्रक्रिया का हवाला दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एनआरसी की प्रक्रिया 30 जुलाई तक पूरी हो जाएगी।
अफ्सपा को साल 1958 में संसद ने पारित किया था। 11 सितंबर, 1958 को अफ्सपा लागू हुआ था। शुरू में यह पूर्वोत्तर और पंजाब के उन क्षेत्रों में लगाया गया था, जिनको अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया गया था। इनमें से ज्यादातर अशांत क्षेत्र की सीमाएं पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश और म्यांमार से सटी थीं। अलग समुदायों, नस्लों, भाषाई या क्षेत्रीय गुटों या जातियों एवं समुदायों के बीच मतभेद या विवाद होने पर किसी क्षेत्र को अशांत घोषित किया जा सकता है। अफ्सपा के सेक्शन 3 के तहत किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश का राज्यपाल भारत के राजपत्र में इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी करेगा। इसके बाद केंद्र सरकार अशांत क्षेत्र में असैन्य प्रशासन की मदद के लिए सशस्त्र बलों को भेजती है।
इस कानून ने सुरक्षा बलों को कई खास अधिकार दिए हैं। अगर कोई कानून के खिलाफ काम करता है तो एक सैनिक उस व्यक्ति पर गोली चला सकता है या शारीरिक बल का इस्तेमाल कर सकता है। जहां हथियार रखे गए हों, उन जगहों को सुरक्षा बल तबाह कर सकता है। वे आतंकियों के अड्डे और प्रशिक्षण शिविरों को भी तबाह कर सकते हैं। इसके अलावा किसी जगह के बारे में यह शक होने की वहां हथियार जमा करके रखा जा रहा है, वहां सैनिक घुसकर उस स्थान की तलाशी ले सकते हैं। वे संदिग्धों को गिरफ्तार भी कर सकते हैं और हथियारों को भी जब्त कर सकते हैं। अगर किसी ने संज्ञेय अपराध किया है तो सशस्त्र बल उसको किसी वॉरंट के बगैर गिरफ्तार कर सकता है। सुरक्षा बलों पर इसके लिए किसी तरह की कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती है। अफ्सपा के तहत किसी तरह की कार्रवाई करने पर सैनिकों के खिलाफ न मुकदमा चलाया जा सकता है और न किसी तरह की कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।
इस कानून की आड़ में सुरक्षा बलों ने काफी अपराध किये हैं। निर्दोष लोगोें को गोली मार देना, कई तरह से यातनाएं देना, किसी भी घर-मकान को ध्वस्त कर देना, निरपराध लोगों को कैद में रखना, किसी के भी घर में घुस जाना, महिलाओं के साथ दुराचार इत्यादि सुरक्षा बलों के कुकृत्य रहे हैं इसीलिए एक ओर जहां देश भर में इस काले कानून का विरोध हुआ है तो वहीं सुरक्षा बल इसे लागू किये रखने के लिए जोर लगाए रहे हैं, इसके लिए वे सुप्रीम कोर्ट के भी चक्कर काट रहे हैं। भाजपा इस कानून की काफी पक्षधर रही है। लेकिन अपनी सुविधा के अनुसार वह पहले भी इसे हटा चुकी है अभी असम में भाजपा की ही सरकार है और उसे जनता को अपने पक्ष में करने के लिए यह काला कानून हटाना फायदे का लग रहा है।

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