अजीम प्रेमजी फाउंडेशन रुद्रपुर में आयोजित गोष्ठी में प्रेमचंद से सीख लेकर आज के समाज की समस्याओं को समझने और जनजागरूकता के लिए काम करने की जरूरत बताई

 

रुद्रपुर (उत्तराखंड)। प्रख्यात कथाकार प्रेमचंद की जयंती पर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के टीजर्स लर्निंग सेंटर, कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय, गांधी कालोनी, रुद्रपुर में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसका संचालन कवि कथाकार शंभूदत्त पांडे ने की और मुख्य वक्ता थे राजस्थान साहित्य अकादमी से संबद्ध रहे प्रख्यात साहित्यकार हेतु भारद्वाज। गोष्ठी में सार रूप में यह बात सामने आई कि प्रेमचंद ने तत्कालीन समाज की सामान्य खूबियां और खामियां सामने रखीं, शोषण, उत्पीड़न, असमानता और ढोंग इत्यादि का विरोध किया। प्रेमचंद से सीख लेकर हम आज के समाज और व्यवस्था को देखें उसे न सिर्फ उजागर करें बल्कि समाज और व्यवस्था में जो खामियां हैं उन्हें ठीक करने के लिए अपना योगदान दें। उन्होंने कहा कि यह प्रेमचंद की लेखनी की ताकत थी कि जब समाज में एक बहुत बड़ी आबादी भयंकर रूप से शोषित थी तब शोषित वर्ग का व्यक्ति उनकी कहानियों का मुख्य नायक होता था।
हेतु भारद्वाज ने बताया कि प्रेमचंद ने उस दौर में लोगो को यथार्थ से जुड़े साहित्य से परिचय करवाकर अपना एक बड़ा पाठकवर्ग तैयार किया जब लोग जासूसी और तिलिस्मी साहित्य पढ़ने के इतने प्रेमी थे कि गैर हिंदीभाषी लोग उसे पढ़ने को हिंदी सीखने लगे थे। उन्होंने कहा कि उस दौर में जब प्रिंट सामग्री आसानी से उपलब्ध नही हो पाती थी और अच्छा साहित्य व साहित्यकारों का ब्रिटिश सरकार द्वारा दमन किया जाता था तब भी लोगो में साहित्य पढ़ने और साहित्यिक चर्चाएं और बैठकों का एक रिवाज सा हुआ करता था मतलब एक बेहतरीन संस्कृति थी जो कि एक अच्छी बात यह थी, लेकिन अब अफसोस की बात है कि आज इतनी सुविधाएं होते हुए भी यह सब देखने को नही मिलता है। उस समय में जब देश गुलाम था तब साहित्यिक चर्चाओं और बैठको के लिए लोग शौक से इकट्ठा हो जाते थे अब आजादी के बाद हम किसी सामाजिक मुद्दे पर बात करने के लिए समय नही निकाल पाते है ।
भारद्वाज जी ने बताया की प्रेमचंद पहले धनपत राय के नाम से लिखा करते थे पर जब ब्रिटिश सरकार द्वारा उनके संकलन सोजे-वतन और अन्य साहित्य को नष्ट किया जाने लगा तो उन्होंने प्रेमचंद के नाम से लिखना शुरू किया, वे हार नही माने लिखते रहे। उन्होंने तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और राजनीतिक विसंगतियों पर अपनी कहानियों, उपन्यासों और लेखों तथा वक्तत्यों के जरिये लोगों को झकझोरा और सोचने-समझने को मजबूर किया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद करुणा और आक्रोष से भरे थे, जिसका आज लोगों में भारी अभाव है इसलिए समाज की दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं। हमें समाज की मुश्किलें बढ़ाने वाले तत्वों की पहचान करनी होगी, उसके खिलाफ जनता में जागरूकता पैदा करनी होगी और सरकार की जनविरोधी नीतियों का सामना करने के लिए सड़कों पर उतरना होगा। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हम प्रेमचंद और इस तरह के अन्य तमाम साहित्यकारों, कवियों, समाजशात्रियों और सत्ता की जनविरोधी नीतियों पर लिखने वाले लोगों को जानना और उनको पढ़ना होगा। हमें हालातों से समझौते करते हुए लगातार समाज और व्यवस्था को बद से बदतर नहीं होने देना चाहिए जबकि इसे बेहतर, जन पक्षधर बनाने के लिए साहस दिखाना होगा।
संचालन करते हुए कवि कथाकार शंभूदत्त पांडे ने कहा कि प्रेमचंद की लिखावट जितनी सहज है उनकी कहानी में उससे कही अधिक गहराइयाँ है, मर्म है, पीड़ा है, प्रेम है, मूल्य है। प्रेमचंद का साहित्य पढ़ने भर को नही बल्कि मंथन करने को है। कहा कि आज से 80-90 साल पहले के समाज को प्रेमचंद को जानें-समझें और आज उस तरह आज के समाज और व्यवस्था को जाने-समझें और खराब हालातों को ठीक करने के लिए अपने स्तर से यथासंभव प्रयत्न करें। गोष्ठी में आज के हालात पर चिंता व्यक्त की गई। बाजार और सरकार द्वारा जनता के सामान्य जीवन में आ रही कठिनाइयों की चर्चा करते हुए कहा गया है कि समस्याएं हमारी सबकी सांझी हैं और हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए हालात और बदतर होंगे। इसलिए हमें सोचने की जरूरत है कि हम कैसा देश अपने बच्चों के लिए छोड़कर जाएंगे।
पत्रकार और मीडिया समीक्षक देवेंद्र यादव अर्श ने मीडिया के सरकार, पूंजीपतियों और नेताओं के गुलाम बन जाने पर चिंता व्यक्त की और कहा कि स्वतंत्र विचारकों को अपनी बात कहने का माध्यम ही नहीं मिल रहा। छोटे, मझोले और बड़े सभी समाचार-विचार और जनसंचार के माध्यम सरकार के सहयोगी की भूमिका निभाते हुए अपने कर्तव्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और जनता को मूर्ख बना सरकार की सहायता कर रहे हैं।
समय समाज और सच्चाइयों के साथ जानी-मानी हिंदी समाचार – विचार वेबसाइट http://peoplesfriend.in के संचालक वरिष्ठ लेखक और पत्रकार अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ ने कहा कि जिस साहस और समझदारी से प्रेमचंद ने तत्कालीन समाज और व्यवस्था की कारगुजारियों को उजागर किया आज की परिस्थियों में हमें भी उस तरह की हिम्मत समझदारी के साथ सत्ता और समाज का सत्य उद्घाटित करना चाहिए, समाज और सम-सामयिक विषयों पर सभा-गोष्ठी कर विचार विमर्श करना चाहिए यह प्रक्रिया निरंतर चले और हमारे विचार जनता और सरकार तक पहुंचते रहने चाहिए। भारती ने कहा कि जब डेढ़-दो सौ साल पहले अमेरिका के मजदूर 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरंजन के अधिकार की मांग करते हुए कुर्बानियां दे रहे थे, मालिकों और पुलिस की मार सह रहे थे तब भी मीडिया और बुद्धिजीवी दो खेमों में बंटे थे। मुख्य मीडिया सरकार और पूंजीपतियों का ही था। 1789 की फ्रांसीसी क्रांति और पुनर्जागरण काल, 1917 की रूसी समाजवादी क्रांति हो या दुनिया की अन्य अनेक क्रांतियां या बड़े जनांदोलन रहे हों सुविधाभोगी बुद्धिजीवियों ने हमेशा ही मुख्यतया सरकार और पूंजीपतियों का साथ दिया है। एक फ्रांसीसी शब्द को ही हिंदी में बुद्धिजीवी कहा जाता है। मूल अर्थ तटस्था या निष्पक्षता अथवा वस्तुनिष्ठता से है। इसका मतलब है जो हकीकत है बुद्धिजीवी को वह बात कहनी चाहिए। भारत में हजारों लोग आज मोदी मंडली की तानाशाही, मनमानेपन के खिलाफ न सिर्फ सड़क पर अपनी जान जोखिम में डालकर बोल, लिख और बहस कर रहे हैं वहीं सुविधाभोगी बुद्धिजीवी सरकार के समर्थन में है। मध्यवर्ग भी वर्तमान भविष्य की चिंता किए बिना सरकार और सत्तारूढ़ दल का समर्थन कर रहा है। मीडिया और जनसंचार के अन्य माध्यमों पर सरकार ने कब्जा ही कर लिया है। ऐसे में हमारे जैसे छोटे लोगों के तमाम समूह, जनपक्षीय मीडिया और स्वतंत्र रूप से लिखने – बोलने वाले तमाम लोगों से सरकार, पूंजीपति, आरएसएस-भाजपा का पूरा तंत्र, मोदी-योगी-शाह जैसों के करोड़ों समर्थक परेशान हैं। सबकुछ सरकार के कब्जे में है लेकिन फिर भी सत्ता-संगठन मुट्ठी भर आलोचकों से परेशान रहती है। भारती ने कहा कि ऐसे में हमें अपनी बात कहने के लिए गोष्ठियों, रैलियों, सभाओं, छोटे अखबार और पत्रिकाओं तथा विशाल सोशल मीडिया माध्यमों मसलन फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्वीटर, इंस्टाग्राम इत्यादि का इस्तेमाल निरंतरता में करते हुए सरकारी दावों का जमीनी परीक्षण करते हुए, सरकारी नीतियों के जनता पर पड़ रहे दुष्प्रभावों, समाज में चल रही तमाम खराब चीजों का तार्किक, तथ्यात्मक और विचारोत्तेजक भाषा और प्रखर तेवरों का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके लिए हमें निरंतर पढ़ना, आपस में बात करना और चीजों को सही रूप में समझना और अपने भीतर हिम्मत पैदा करनी होगी।
गोष्ठी में अन्य वक्ताओं ने बोलते हुए इस तरह के आयोजनों की निरंतरता पर जोर दिया और गोष्ठी के आयोजन के लिए अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के अश्विनी पाटिल की सराहना की। अश्विनी ने आयोजन को सफल बनाने के लिए अतिथियों का आभार प्रकट किया। यहां साहित्यकार हेतु भारद्वाज, शंभूदत्त पांडे, प्राथमिक शिक्षक नीरज भारद्वाज, सीमा नैथानी, सुमन रानी, बीना श्रीवास्तव, मनोज कुमार, प्रवक्ता दीपा पांडेय, खेमकरण सोमन, मनोज पांडेय, कमला बिष्ट, अध्यापक संजय श्रीनद, स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक अयोध्या प्रसाद ‘भारती’, पत्रकार देवेंद्र यादव अर्श, रचनाकार और साहित्य समीक्षक किरण अग्रवाल, सबाहत हुसैन खान, रिसर्च स्कॉलर रेशु पनेरू, सामाजिक कार्यकर्ता नवीन चिलाना, वरिष्ठ समाजसेवी अविनाश गुप्ता, युवा सामाजिक कार्यकर्ता कयूम अंसारी, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन सदस्य प्रियंवद, मोअज्जम, अश्विनी पाटिल आदि अनेक लोग मौजूद थे।

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